पंजाब के प्रसिद्ध कवि पाश की जन्मतिथि है

पंजाब के प्रसिद्ध कवि पाश की जन्मतिथि है
World

पंजाब के प्रसिद्ध कवि पाश की जन्मतिथि है

2020-09-09 11:48:18

आज पंजाब के प्रसिद्ध कवि पाश की जन्मतिथि है, पाश के बागी कविताओं और विरोध के स्वर से बौखलाए खालिस्तानियों ने मात्र सैतीस साल की छोटी उम्र में ही उनकी हत्या कर दी ।
पंजाब के तलवंडी में जन्मे पाश बहुत कम उम्र में ही पूरे भारत के हो गए । दमन और शोषण के खिलाफ प्रतिरोध में पाश की कविताएँ बहुत अदब से सुनी और सुनाई जाती है ।

"आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता.
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता.
कुछ नहीं सोचनें
और कुछ नहीं बोलनें पर
आदमी
मर जाता है'

उदय प्रकाश की इस कविता को पढ़ते हुए अक्सर पाश याद आतें हैं । ज़िन्दा लाशों के देश मे पाश न सिर्फ सोचता और बोलता रहा बल्कि वो ज़िदगी और इंसानियत के लिए लड़ता भी रहा । जीते जी ही नही मरने के बाद भी पाश की आवाज लोगो के ज़मीर को झकझोरती रही । पाश आज भी जिंदा है लोगो की दिलों में, प्रगतिशील समाजविचारकों के ज़ेहन मे ।
हिन्दी के पाठको मे जब सबसे चर्चित पंजाबी कवि का नाम पूछा जाता है तब जवाब सिर्फ एक ही होता है -अवतार सिँह संधू । जिन्हे 'पाश' के नाम से भी जाना जाता है । क्रांतिकारी विचारधारा से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने पाश की कविताएँ न पढ़ी हो । इसी तरह 'पाश' मेरे भी पसंदीदा कवियो में से एक हैं ।
अक्सर पाश को पढ़ते हुए आस-पास की ज़ुल्मतों की सारी घटनाएँ सिलसिलेवार ढंग से आँखो के सामने नाचनें लगती हैं । पाश की कविताएँ कोयले की खादान जैसी है जहाँ अंदर जाकर आप कालिख़ से अनछुए होके नही आ सकते ।
पाश को ऐसे क्रांतिकारी कवि के रूप में देखा जाता है जो हमेशा विरोध की बात करता है लेकिन पाश विद्रोह के स्वर में जब सोनी-माहिवाल, हीर रांझा, मिर्जा-साहिबा की प्रेमकहानियो को भी शामिल करता है तो उसकी एक नयी तरह की शैली सामने आती है । पाश की ये विशेषता उसे बाकी क्रांतिकारी कवियो से अलग करती है । उसकी आवाज मे विद्रोह है, प्रेम है, आंचलिकता है, विषाद है, दर्द है, गुस्सा है लेकिन कविता का मूल भाव मे आशा की किरण है । पाश की कविताओ में एक चीज जो आपको कहीं नही मिलेगी वो है "बीच का रास्ता" । पाश समझौतों से नफरत करता था क्योकि सच्चे क्रांतिकारी कभी समझौता नही करते ।
इतिहास में जब भी जुल्मतो के दौर की गाथाएँ सुनाई जाएगी पाश की कविताए बड़े ही अदब से सुनाई जाएगी ।
गरीबी से जूझ रही आवाम जब आपातकाल झेल रही थी तब पाश बड़े बेखौफ होके बेबाकी से कहते हैं-

"जिन्होने देखे हैं
छतों पर सूखते सुनहरे भुट्टे
और नही देखे
मंडियो मे सूखते दाम
वें कभी न समझ पाएंगे
कि कैसे दुश्मनी है
दिल्ली की उस हुक्मरान औरत की
नंगे पांवो वाली गांव की उस सुंदर लड़की से"


('उड़ते हुए बाजो के पीछे' कविता का अंश)

आज के दौर में जब फेक-नेशनलिज्म का तांडव चरम पर है । राष्ट्रवाद की नयी-नयी परिभाषाएँ गढ़ी जा रही है । देशभक्ति के नाम पर सिर्फ "भारत माता की जय" और "वंदे मातरम" भर कहना ही शेष रह गया है । पाश की पहली किताब 'लौहकथा' की पहली ही कविता 'भारत' मे हमे भारत की सच्ची तस्वीर दिखाती देती है ।


भारत-

"मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहां कहीं भी प्रयोग किया जाये
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं
इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में है
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं
और वह भूख लगने पर
अपने अंग भी चबा सकते हैं
उनके लिए जिंदगी एक परंपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति
जब भी कोई समूचे भारत की
राष्ट्रीय एकता की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है-
उसकी टोपी हवा में उछाल दूं
उसे बताऊं
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं
वरन खेतों में दायर हैं
जहां अन्न उगता है
जहां सेंध लगती है"

पाश की कविता मे सच्चाई की भीषण गंध है जले हुए लोहे की तरह ।
'लौहकथा' मे समाज के शोषक-शोषितो को रेखांकित करते हुए पाश कहते हैं

"लोहे ने बड़ी देर इंतजार किया है
कि लोहे पर निर्भर लोग
लोहे की पत्तियाँ खाकर
खुदकुशी करना छोड़ दें
मशीनो में फंसकर फूस की तरह उड़ने वाले
लावारिसो की बीवियाँ
लोहे की कुर्सियो फर बैठे वारिसो के पास
कपड़े तक खुद उतारने के लिए मजबूर न हों"


पाश मुकम्मल आजाद मुल्क में सांस लेना चाहता था, गले तक जिंदगी जीना चाहता था । उसने देश के लिए समतावादी, समाजवादी सपना देखा था लेकिन तमाम दुश्मनों से घिरा, अपनो से छला हुआ आदमी क्या कर सकता ? पाश लड़ता रहा न सिर्फ पंजाब की सामप्रदायिक ताकतों से, न सिर्फ दमनकारी सरकार से बल्कि उन धोखेबाज आंदोलनकारी कम्युनिस्टों से भी जिन्होने संघर्ष का रास्ता छोड़कर अवसरवाद की राह पकड़ ली । उन्हे लानतें देता हुआ पाश कहता है-

"यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दो ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊ
मार्क्स का सिंह जैसा सिर
दिल्ली की भूलभुलैया में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारो, ये कुफ्र हमारे ही समयों मे होना था "


पाश ने अपने समय की सारी समस्यायों को रेखांकित किया है, 'चिड़िया का चंबा' कविता में पंजाब की युवतियो की दुर्दशा के बारे मे पाश लिखता है-

"चिड़ियो का चंबा उड़कर
किसी भी देश न जाएगा
सारी उम्र कांटे चारे के झेलेगा
और सफेद चादर पर लगा
उसकी माहवारी का रक्त उसका मुँह चिढ़ाएगा"


 पाश एक कवि भर ही नही था वो क्रांति का सिपाही था । पाश अपनी लड़ाई दोहरे मोर्चे पर लड़ रहा था एक तरफ वो तानाशाह दमनकारी सरकार से लड़ रहा था तो वहीं दूसरी तरफ पंजाब के सामप्रदायिक ताकतों से । पाश भगत सिंह की वैचारिक विरासत का सच्चा वारिस था जो आखिरी सांस तक अन्याय के खिलाफ लड़ता रहा और शांति के दुश्मनो को खौफज़दा करता रहा । आखिरकार खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा 23 मार्च 1988 को यानी भगत सिंह की शहादत के ठीक 57 साल बाद गोलियों से छलनी कर मार डाला गया ।

जिंदगी के बारे में पाश लिखता है


"तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त,
सिवाय इसके
कि मुझे जीने की बहुत लालसा थी
कि मैं गले तक जिंदगी में डूबना चाहता था
मेरे हिस्से का भी जी लेना, मेरी दोस्त
मेरे हिस्से का भी जी लेना ।
-मैं अब विदा लेता हूँ कविता से"

पाश की इस कविता को जानी-मानी अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने अपनी भी आवाज दी है ।
प्रो. चमनलाल द्वारा पाश की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन किया गया है

मरा हुआ पाश जीवित पाश से कहीं ज्यादा खतरनाक है । मरे हुए पाश के सीने मे कोई गोली नही दाग सकता । मरा हुआ पाश अमर है कोई उसका कुछ नही बिगाड़ सकता ।
हम पाश को पढ़ेंगे, यार-दोस्तों को पढ़ाएंगे, मेहनतकशों के बीच ले जाएंगे । पाश ने जो सपना देखा था उस सपने के लिए नींद की नज़र अख़्तियार करेंगे । पाश हर जगह है, गौर से देखो विश्वविद्यालयों में दमन के बाद हजारो की संख्या मे पाश निकल रहे हैं । खेतों और कारखानों से निकल रहे हैं । घूंघट और रसोई की दहलीज़ से लड़कियाँ पाश बनकर निकल रही हैं । महलो-अट्टालिकाओ की दरार मे घास झूल रही हैं और वहीं से पाश झांक रहा है ।

भगत सिंह के बारे मे अपनी एक टिप्पणी में पाश कहता है कि "जिस दिन भगत सिंह को फांसी हुई, उसके कमरे में लेनिन की किताब मिली, जिसका एक पन्ना मोड़ा हुआ था । पंजाब की जवानी को उस मोड़े हुए पन्ने से आगे जाना है ।"
लेखिका कात्यायनी के शब्दों में "खालिस्तानियों की गोली से शहीद होने से पहले पाश भी जिंदगी और शायरी की जद्दोजहद की किताब का एक पन्ना मोड़ा हुआ छोड़ गया था । पंजाब और पूरे भारत के प्रतिबद्ध कवियों को उसी मोड़े हुए पन्ने से आगे बढ़ना है ।


-सम्राट विद्रोही